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‘विपक्ष की भूमिका सिर्फ चुनाव तक?’: कटनी में पुतला दहन तक बात पहुंची, पर कांग्रेस ने नहीं दिया एक भी बयान

पुतला दहन हुआ, FIR नहीं हुई, और कांग्रेस... चुप है: कटनी के सियासी ‘त्रिकोण’ में विपक्ष सबसे कमजोर कड़ी?

लेख: कटनी की सियासत में ‘चुप्पी’ का शोर: पुतला तो जल गया, पर भ्रष्टाचार के आरोपी ‘चेहरे’ क्यों बेदाग?*

 

*कटनी, 12 मई 2026।* कटनी की राजनीति में इन दिनों एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। यहां पुतले तो फूंके जा रहे हैं, ज्ञापन पर ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं, कलेक्ट्रेट के सामने वाटर कैनन भी चल रही है—लेकिन भ्रष्टाचार के जिस ‘चेहरे’ पर सवाल उठ रहे हैं, वो आज भी बेदाग है। सवाल ये है कि आखिर कलेक्टर कार्यालय की कलम वहां क्यों कांप जाती है, जहां कार्रवाई सबसे जरूरी है?

 

*1. कांग्रेस की ‘रणनीतिक चुप्पी’ या मजबूरी?*

विजयराघवगढ़ के 10 हजार कथित बारदाना घोटाले ने जिले की सियासत में भूचाल ला दिया। OBC महासभा ने सड़क पर उतरकर प्रदेश के चर्चित विधायक संजय पाठक का पुतला तक फूंक दिया। ‘संरक्षक कौन?’ के पोस्टर शहर भर में चिपक गए।

 

लेकिन इस पूरे बवंडर में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस कहीं नजर नहीं आई। न कोई बयान, न धरना, न विधानसभा में सवाल। क्या ये चुप्पी रणनीतिक है? या फिर कांग्रेस को डर है कि भ्रष्टाचार का ये कीचड़ उसके भी दामन पर आ जाएगा? जब सत्ता पक्ष का विधायक जनता के निशाने पर हो, तब विपक्ष का खामोश रहना—सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर रहा है। जनता पूछ रही है कि क्या विपक्ष की भूमिका सिर्फ चुनाव तक सीमित रह गई है?

 

*2. कलेक्टर की ‘हठधर्मिता’: SDM की रिपोर्ट भी रद्दी की टोकरी में?*  

इस पूरे मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू कलेक्टर कार्यालय का रवैया है। कांटी गेहूं खरीदी केंद्र पर 10 हजार बारदाना जब्त हुए 20 दिन से ज्यादा हो गए। SDM और तहसीलदार की संयुक्त जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी की पुष्टि भी हो चुकी है। रिपोर्ट कहती है—घोटाला हुआ है।

इसके बावजूद कांटी खरीदी केंद्र प्रभारी अनमोल दुबे पर FIR तक दर्ज नहीं हुई। OBC महासभा चीख-चीख कर पूछ रही है—‘आखिर इतनी हिम्मत आती कहां से है? कौन है अनमोल दुबे का संरक्षक?’

जब SDM जैसी जिम्मेदार संस्था की जांच को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए, तो इसे प्रशासनिक हठधर्मिता नहीं तो और क्या कहेंगे? एक तरफ कन्हवारा की 8 समस्याओं पर ज्ञापन देने वाले ग्रामीणों को 15 दिन का अल्टीमेटम देना पड़ता है, दूसरी तरफ एक प्रमाणित घोटाले की फाइल पर धूल जम रही है। ये दोहरा मापदंड क्यों?

 

*3. पुतला दहन हुआ, पर ‘असली चेहरा’ बचा कैसे?*

11 मई को OBC महासभा ने कलेक्ट्रेट के सामने विधायक संजय पाठक का पुतला फूंका। पुलिस को वाटर कैनन चलानी पड़ी। लोकतंत्र में विरोध का ये तरीका जायज-नाजायज हो सकता है, पर सवाल बड़ा है। 

 

प्रशासन ने पुतला दहन होने दिया। प्रदर्शन भी होने दिया। लेकिन जिस अनमोल दुबे के नाम पर पूरा बवाल है, उस पर कार्रवाई शून्य है। आरोपी खुद मीडिया को धमका रहा है कि “जिले में मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, राष्ट्रीय स्तर पर जाओ।”

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ये बयान सिस्टम पर तमाचा है। जब एक खरीदी केंद्र प्रभारी इतने दुस्साहस से बोल सके, तो सोचिए उसके पीछे कितनी बड़ी ‘ताकत’ खड़ी होगी। पुतला तो प्रतीक का जलता है, पर असली चेहरे पर आंच क्यों नहीं आ रही?

 

*4. ‘नगण्य कार्रवाई’ के पीछे की कहानी क्या है?

कटनी कलेक्टर कार्यालय की साख दांव पर है। जनता के जेहन में तीन सवाल गूंज रहे हैं:

पहला— क्या अनमोल दुबे अकेला है, या ये किसी बड़े ‘सिंडिकेट’ का मोहरा मात्र है?

दूसरा— जब SDM की रिपोर्ट आ चुकी, तो EOW या पुलिस जांच में देरी क्यों?

तीसरा— कन्हवारा के ग्रामीणों को 15 दिन का अल्टीमेटम देना पड़ता है, तो कथित बारदाना घोटाले के आरोपियों को 20 दिन की मोहलत क्यों?

 

कलेक्टर कार्यालय की चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही है। पुतला दहन से सियासी तापमान भले बढ़ जाए, पर न्याय की आग ठंडी पड़ती दिख रही है

 

*निष्कर्ष: जवाब तो देने होंगे*

लोकतंत्र में विपक्ष का खामोश रहना और प्रशासन का ‘चुनिंदा’ सख्त होना—दोनों खतरनाक हैं। कांग्रेस को तय करना होगा कि वो जनता की आवाज बनेगी या सियासी गणित में उलझी रहेगी। और कलेक्टर कार्यालय को जवाब देना होगा कि SDM की रिपोर्ट के बाद भी अनमोल दुबे और ‘अन्य जिम्मेदारों’ पर कार्रवाई क्यों नगण्य है।

 

क्योंकि पुतले तो हर रोज जलते हैं, पर जब तक भ्रष्टाचार के असली चेहरे बेनकाब नहीं होते, तब तक जनता का भरोसा भी जलता रहेगा। और वो आग किसी वाटर कैनन से नहीं बुझेगी।

 

डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आरोपों, ज्ञापनों और प्रदर्शनों पर आधारित विश्लेषण है। इसमें किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने का उद्देश्य नहीं है। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट ही अंतिम सत्य मानी जाएगी।_

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