सुनियोजित साजिश या लापरवाही? केजुअल्टी में पहले से रखा “बयान वाला कागज” उठा रहा गंभीर सवाल
सिविल सर्जन बोले "मरीज खुद कहता है इसलिए लिखवाते हैं" | पीड़ित बोले "बिना लिखे इलाज नहीं होता" - कौन सच बोल रहा?

कटनी जिला अस्पताल का “दफ़्तीनुमा कागज” विवाद: सिविल सर्जन बोले – “40 साल से यही प्रक्रिया है”
*कटनी।* जिला अस्पताल की केजुअल्टी में रखे “दफ़्तीनुमा कागज” को लेकर उठे सवालों पर सिविल सर्जन *डॉ. यशवंत वर्मा* ने सफाई दी है।
सिविल सर्जन डॉ. वर्मा का कहना है कि यह फॉर्मेट इसलिए रखा गया है क्योंकि कई बार दुर्घटनाग्रस्त मरीज खुद ही बताते हैं कि “उनकी स्वयं की गलती से गाड़ी स्लिप हो गई”। ऐसे मामलों में मरीजों से लिखवाया जाता है कि वह पुलिस कार्यवाही नहीं चाहते और केवल इलाज करवाना चाहते हैं।
डॉ. वर्मा ने कहा _”मैं खुद चालीस साल से नौकरी कर रहा हूं और देख रहा हूं। यह कोई नई प्रक्रिया नहीं है। जब मरीज खुद कहता है तो उससे बयान लिया जाता है।”_
*लेकिन सवाल अब भी बरकरार*
1. *बाध्यता का आरोप:* मरीजों/परिजनों का आरोप है कि बयान लिखवाने के बाद ही इलाज शुरू किया जाता है। क्या “खुद कहने” की स्थिति में भी लिखवाना अनिवार्य है?
2. *एमएलसी का नियम:* स्वास्थ्य नियमों के अनुसार दुर्घटना/चोट के मामलों में एमएलसी और पुलिस सूचना अनिवार्य है। ऐसे में “पुलिस कार्यवाही नहीं चाहिए” लिखवाने का क्या औचित्य?
3. *दफ़्तर में क्यों रखा?* अगर यह सिर्फ मरीज के कहने पर है तो एक फॉर्मेटेड कागज केजुअल्टी में पहले से क्यों रखा गया है?
विगत दिनों एक कार दुर्घटना के मामले में भी पहले दिन एमएलसी नहीं हुई थी। दूसरे दिन जाकर मुलाहिजा हुआ। रविवार को सीएमएचओ से संपर्क का प्रयास किया गया पर फोन बंद मिला।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज की मर्जी का सम्मान जरूरी है, लेकिन कानून की प्रक्रिया को टाला नहीं जा सकता। मामले में ठोस वजह की निष्पक्ष जांच नितांत आवश्यक है।




