सरकारी जलाशय की जमीन पर डाका, प्रशासन मौन – कन्हवारा से पिपरौंध तक एक ही कहानी
कहीं तालाब बना खेत, कहीं जलाशय पर ढाबा - जल स्रोतों पर कब्जे का बड़ा खेल

Katni Exclusive: कटनी में थम नहीं रहा जल स्रोतों पर कब्जे का खेल, कहीं तालाब बना खेत तो कहीं जलाशय पर दौड़ रहा ढाबा, प्रशासन मौन
कटनी। जिले में प्राकृतिक जल स्रोतों पर अवैध कब्जे का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रशासन की उदासीनता के चलते सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तालाबों और जलाशयों पर बकायदा खेती, भट्टे और ढाबा-रेस्टोरेंट संचालित हो रहे हैं, और जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं।
ताजा मामला दो जगहों का है जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला-1: कन्हवारा का राम तालाब – कागज पर 11.45 हेक्टेयर, जमीन पर सोयाबीन की खेती
कन्हवारा स्थित ऐतिहासिक राम तलाब (रमतलाय) राजस्व रिकॉर्ड में 11.45 हेक्टेयर में दर्ज है, लेकिन मौके पर वहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार वहां खेत बनाकर बकायदा फसल बोई जा रही है। इस अतिक्रमण की शिकायत सीएम मोहन यादव के जन समस्या निवारण शिविर में भी हो चुकी है, लेकिन एक हफ्ते से फाइल SDM ऑफिस में धूल खा रही है। ये सीधे तौर पर सीएम के जल गंगा संवर्धन अभियान को ठेंगा दिखाने जैसा है।
मामला-2: पिपरौंध में जलाशय की सरकारी जमीन पर ‘अग्रवाल ढाबा एंड फैमिली रेस्टोरेंट’
दूसरा मामला पिपरौंध मोड़, राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे का है। यहां खसरा क्रमांक 83 की भूमि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार जलाशय/जल संरचना के रूप में दर्ज है। इसी भूमि पर सालों से ‘अग्रवाल ढाबा एंड फैमिली रेस्टोरेंट’ का निर्माण कर नियम विरुद्ध संचालन किया जा रहा है। होटल, रेस्टोरेंट, पार्किंग जैसी व्यावसायिक गतिविधियां खुलेआम चल रही हैं।
स्थानीय लोगों और RTI कार्यकर्ताओं द्वारा कई बार शिकायत के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे प्रशासनिक चुप्पी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
*एक ही पैटर्न – शिकायत, खबर, फिर खामोशी*
चाहे कन्हवारा का राम तालाब हो या पिपरौंध का जलाशय, पैटर्न एक ही है। ग्रामीण शिकायत करते हैं, जिले की मीडिया सक्रियता से खबरें प्रकाशित करती है, मामला सीएम के शिविर तक पहुंचता है, लेकिन धरातल पर कार्रवाई नगण्य है।
सवाल ये है कि जब सरकारी जमीन पर कब्जा है तो बुलडोजर कब चलेगा? क्या कानून सबके लिए समान है या कुछ प्रभावशाली लोगों के लिए अलग?
यदि आज भी कार्रवाई नहीं हुई तो कल ये जलाशय इतिहास बन जाएंगे और आने वाली पीढ़ी पानी के लिए तरसेगी।
*रिपोर्ट – निडर आवाज टीम, कटनी*




