कटनी-जबलपुर की पचेली बोली को मिली पुस्तकीय पहचान, 29 रचनाकारों की कविताएं संकलित
पांच बोलियों का संगम 'पचेली': विजय बागरी के संपादन में काव्य संकलन, इंटैक कटनी ने किया पुस्तकाकार प्रकाशन

*कटनी/जबलपुर।* ‘गांव पांच सौ बसै पचेल, बीचों बीच जिखे परसेल’… कटनी-जबलपुर के ग्रामीण अंचलों की बोली “पचेली” अब साहित्य के मानचित्र पर दर्ज हो रही है। शब्द शिल्पी प्रकाशन सतना से श्री विजय बागरी ‘विजय’ के संपादन और श्री मदन पेंटर के सह-संपादन में “पचेली काव्य वीथिका” काव्य संकलन प्रकाशित हुआ है। इसे विरासत संरक्षण संस्था इंटैक, कटनी चैप्टर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित कर रहा है। संकलन के सूत्रधार राजेन्द्र सिंह ठाकुर हैं।
*पांच बोलियों का संगम*
कटनी जिला बघेलखंड, बुंदेलखंड और गोंडवाना के त्रिकोण पर स्थित है। इसी कारण यहां की बोली में तीनों क्षेत्रों की संस्कृति के साथ खड़ी हिंदी और उर्दू का मिश्रण है। भाषा विज्ञानियों ने पांच बोलियों के मिश्रण के कारण इसे “पचेली” नाम दिया है। भारत के भौगोलिक केंद्र करौंदी पान-उमरिया की परिधि वाला 250 वर्ग किमी क्षेत्र ही पचेल अंचल है।
*कवर पर झलका पचेल का जीवन*
किताब के कवर पर ही पचेल की मिट्टी बोलती है – बरगद के नीचे बैठे लोग, खेतों में जाती पगडंडी, तालाब में तैरती बत्तखें और लौटता किसान। यही पचेल है, यही पचेली है।
*कविता में लोकजीवन*
संकलन में 29 रचनाकारों की कविताएं हैं। श्री प्रमोद दाहिया ने पचेल का गुणगान किया:
_”ब्बू-बैया मिलके गाबा, गाथा या पचमेल की।
मध्यप्रदेश मा नीक लागै, बातें करी पचेल की।”_
उदयभानु तिवारी ‘मधुकर’ ने किसान की पीड़ा लिखी:
_”बुआ कस होय किसानी।
आँख मिचौनी बिजली खेले, मिलै तनक सो पानी।”_
डॉ. कौशल दुबे ने संस्कारों की महक दी:
_”ऊँच नीच सब खैं बिचार के पाँव अगारु धरनैं।
फसल प्रेम की लहलहाय बब्बू या कोशिश करनैं।”_
विजय बागरी ‘विजय’ ने सामाजिक विषमता को शब्द दिए:
_”जाँगर प्यारैं रोज टहलुआ राम दुहाई
मजा उड़ामैं लगुआ भगुआ राम दुहाई”_
*आगे की राह*
पचेली साहित्य अब सिर्फ कविता तक सीमित नहीं। डॉ. कौशल दुबे का काव्य संकलन पहले ही आ चुका है। अब अखिलेश खरे ‘अखिल’ का पचेली नवगीत संकलन और एक पचेली गद्य संकलन प्रकाशनाधीन है। डॉ. सुरेंद्र सिंह बागरी के संयोजन में पचेली शब्दकोश भी तैयार हो रहा है।
*पद्मश्री बाबूलाल दाहिया का आशीर्वाद*
बघेली के शिखर पुरुष पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने कहा – “पचेली में बघेली, बुंदेली, गोंडी, फारसी और संस्कृतनिष्ठ हिंदी का सम्मिश्रण है। भारत के सेंटर प्वाइंट की बोली होने के नाते इसका अपना महत्व है। मेरी शुभकामना है कि पचेली निकट भविष्य में मध्यप्रदेश की पांचवीं बोली का दर्जा प्राप्त करे।”




